योग पत्रकारिता का उषाकाल

किशोर कुमार July 5, 2020

गुरू पूर्णिमा के मौके पर “उषाकाल” बेवसाइट आप सबके समक्ष औपचारिक रूप से प्रस्तुत करते हुए खुशी हो रही है। यह योग पत्रकारिता का “उषाकाल” है। योग विज्ञान और वैज्ञानिक आध्यात्मवाद की बातें पत्रकारीय दृष्टिकोण से परख कर योगाभ्यासियों के साथ साझा करने का छोटा-सा प्रयास है। बेशक, नई किस्म की पत्रकारिता है। पर आधुनिक युग की जरूरतों के अनुरूप है।

ऐसी पत्रकारिता की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जा रही थी। यह निर्विवाद है कि आज की अनेक समस्याओं की जड़ में व्यक्तिगत और सामाजिक असंतुलन है। समाज विज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों से लेकर वैज्ञानिक संतों तक ने इस विषय पर खूब अध्ययन किया। इनके निष्कर्षों से वैज्ञानिक संतों के इस विचार को बल मिला कि कोई दर्शन या विचारधारा इस असंतुलन को दूर करने में सक्षम नहीं है। इस समस्या से मुक्ति का कोई कारगर मंत्र है तो वह योग और अध्यात्म ही है।

जाहिर है कि योग और अध्यात्म की महत्ता को प्रकारांतर से दुनिया भर में स्वीकार किया जा रहा है। इसके वैज्ञानिक पहलुओं पर निरंतर अध्ययन किया जा रहा है। परिणामस्वरूप वैसी बातें प्रमाणिक रूप से सामने में आ रही हैं, जिनका उल्लेख वेद, तंत्र और योग शास्त्रों में है। आधुनिक युग के वैज्ञानिक संत भी अपनी साधनाओं के अनुभवों के आधार पर  शास्त्रों में उल्लिखित बातों को सत्य ठहराते रहे हैं। पर उनकी बातों को आमतौर पर तभी स्वीकार्यता मिलती है, जब आधुनिक विज्ञान कहता है कि हां, बात सही है। उदाहरण के तौर पर योग की शांभवी मुद्रा तंत्र कि विषय है। शंकर-पार्वती संवाद के रूप में तंत्र शास्त्र में उसका उल्लेख है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में शांभवी मुद्रा के प्रभावों का अध्ययन किया गया तो उसके नतीजे शिव-पार्वती संवाद में बताए गए लाभों के अनुरूप निकले।

योग की स्वीकार्यता बढ़ने के साथ ही चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। गुणवत्तापूर्ण योग शिक्षा का अभाव सर्वत्र है। एसोचैम के मुताबिक मांग की तुलना में तीन लाख योग शिक्षक व प्रशिक्षक कम हैं। कुशल योग शिक्षकों की कमी योग के नीम हकीम पूरी करते दिखते हैं। दूसरी ओर योग के बड़े कारोबारी मैदान में हैं, जो करोड़ों की लागत से योगा स्टूडियो बनाकर योग और अध्यात्म को उत्पाद बनाए बैठे हैं। ऐसे में योग के नाम पर कुछ भी परोस देने की प्रवृत्ति आम है। इसके कुपरिणाम भी सामने आते रहते हैं। इन सबके बीच दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि योगशास्त्र और परंपरागत योग मेनस्ट्रीम मीडिया का प्रिय विषय नहीं है।

आधुनिक यौगिक एवं तांत्रिक पुनर्जागरण के प्रेरणास्रोत और बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती कहते थे, “वेद का पुत्र तंत्र है और तंत्र का पुत्र योग है। तंत्र एक महान विद्या है।“ पर गलत दिशा मिल जाने से उसका हश्र हम सबके सामने है। इससे समाज ने काफी खोया। योग का हश्र भी अपने पिता (तंत्र) की तरह ही न हो जाए, इसके लिए पूरी गंभीरता से पत्रकारीय हस्तक्षेप की जरूरत है। मैं लंबे समय से इस बात का पक्षधर हूं कि योग विज्ञान और अध्यात्म विज्ञान गंभीर किस्म की पत्रकारिता का अनिवार्य विषय होना चाहिए। इस प्रेरणा के पीछे ठोस वजह है। पत्रकारिता तो लंबे समय से कर रहा था। योग पत्रकारिता की बात कभी नहीं सूझी थी। पर विश्व प्रसिद्ध बिहार योग विद्यालय के संपर्क में गया और परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती से दीक्षा ली तो देखते-देखते सोचने का तरीका बदल गया। लेखन की दिशा बदल गई। पहले “उषाकाल” स्तंभ और अब उषाकाल डॉट कॉम उसी की परिणति है।

मैं आज खास मौके पर अपने परम गुरू परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती (महासमाधिलीन) और पूज्य गुरू स्वामी निरंजनानंद सरस्वती की चरणों को शत्-शत् नमन करता हूं, जिनकी सूक्ष्म शक्ति हमेशा कुछ नया करने को प्रेरित करती रहती है। उन तमाम गुरूओं का वंदन है, जो धर्मों की सीमाओं से परे योग-शक्ति की बदौलत मानव कल्याण में जुटे हुए हैं। शब्द की शक्ति प्रदान करने वाले मेरे जीजा जी, मेरे प्रारंभिक गुरू, शिक्षाविद् व साहित्यकार दिवंगत रवीन्द्र करूण और पत्रकारिता के जरिए सेवा का पाठ पढ़ाने वाले पिता तुल्य यशस्वी पत्रकार दिवंगत सतीशचंद्र को सादर प्रणाम। उनका प्रेम दोषरहित, भेदरहित और अभिलाषारहित था। इससे निर्मित संस्कार की जीवन में बड़ी भूमिका है। मेरी पत्नी ममता श्रीवास्तव के गुजरे आठ साल बीत चुके हैं। पर ऐसा महसूस होता है कि आसपास ही हैं और इस मार्ग पर आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही हैं।

भारतीय पुलिस सेवा के वरीय अधिकारी रहे और अपनी कलात्मक सोच व प्रभावशाली संप्रेषण की बदौलत रचनात्मक कार्यों में जुटे श्री उदय सहाय का विशेष तौर से आभार। मित्र के तौर पर उनका प्रोत्साहन कई स्तरों पर है। पर इस बेवसाइट की परिकल्पना को मूर्त रूप देने में उनकी मुख्य भूमिका रही।

योग विज्ञान के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक पहलुओं को ध्यान में रखकर लेखन और पत्रकारिता हेतु प्रेरित करने के लिए आप सभी का तहेदिल से आभार। उम्मीद है कि पूर्ववत सहयोग मिलता रहेगा।      

: News & Archives