किशोर कुमार February 8, 2021

 

प्राणिक ऊर्जा नियंत्रण का विज्ञान है मुद्रा योग। हठयोग में आसन और प्राणायाम के बाद मुद्रा योग प्रमुख है। यह शास्त्र-सम्मत तो है ही,  विज्ञान-सम्मत भी है। तभी रोगोपचार के तौर पर मुद्रा योग भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर देशों में लोकप्रिय है। साठ के दशक में गोल्डी लिप्सन ने अपनी पुस्तक “रिजुवेनेशन थ्रू योगा” में योग मुद्राओं के बारे में लिखा था कि यह उंगलियों का व्यायाम भर है। पर आज पश्चिमी देशों में इसे स्वतंत्र विद्या के तौर पर अपनाया जा चुका हैं। भारत में भी मुद्रा चिकित्सा का प्रचलन बढ़ रहा है। पर ज्यादातर योगाचार्य शारीरिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी मुद्रा योग का अभ्यास पारंपरिक रूप से ही कराते हैं।  यह मुद्रा योग की शक्ति का कमाल है।

बीकेएस आयंगार के आयंगार योग के दुनिया भर में छा जाने के पीछे भी मुद्रा योग की शक्ति बड़ी वजह बनी थी। यह कहानी आम है कि इंग्लैंड के मशहूर वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन को आयंगार के कारण ही लाइलाज बीमारी से मुक्ति मिली थी। नतीजतन, वे आयंगार से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्हें इंग्लैंड बुलाकर यूरोप और पश्चिमी दुनिया को उनके योग के जादू से परिचित कराया था। पर इस बात की चर्चा कम ही होती है कि येहुदी मेनुहिन को आखिर कौन-सी यौगिक क्रियाएं करवाई गई थी। दरअसल, मेनुहिन कोहनी के हाइपरेक्स्टेंशन से पीड़ित थे। ब्रेंकियल आर्टरी गंभीर रूप से प्रभावित हो गई थी। न्यूरो कार्डियोलॉजी से संबंधित मामला होने के कारण असहनीय दर्द के साथ ही अन्य संभावित खतरे भी परेशान करने वाले थे।

मेनुहिन भारत के दौरे आए तो आयंगार ने उन्हें शवासन की स्थिति में षण्मुखी मुद्रा करवाई। आमतौर पर इस मुद्रा का अभ्यास पद्मासन या सिद्धासन में कराया जाता है। पर आयंगार ने मेनुहिन के मामले में बिल्कुल अलग विधि अपनाई। नतीजा हुआ कि पांच मिनट भी नहीं बीते और मेनुहिन एक घंटे तक बेसुध सोए रहे। जो काम नींद की दवाएं नहीं पा रही थी और कई-कई रातें जगकर बितानी होती थी, वह काम पांच मिनटों के अभ्यास में हो गया था। मेनुहिन की नींद खुली तो उन्हें खुशी का ठिकाना न रहा। वे पहले सुनते थे, अब खुद ही भारतीय योग-शक्ति के गवाह बन चुके थे। उन्होंने अपने तमाम कार्यक्रम रद्द करके आयंगार के साथ हो लिए।

मोनुहिन चंद महीनों के यौगिक अभ्यासों की बदौलत रोग-मुक्त हो गए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को इस बात की जानकारी मिली थो उन्हें भरोसा न हुआ था। उन्होंने तब के प्रधानमंत्री आवास तीनमूर्ति भवन में आयंगार के साथ ही मेनुहिन को बुलाया। शीर्षासन करने की चुनौती दी। बिल्कुल स्वस्थ्य हो चुके मेनुहिन ने आराम से यह योगाभ्यास कर दिखाया। इससे नेहरू जी इतने उत्साहित हुए कि खुद भी शीर्षासन कर बैठे। इस खबर ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां पाई थीं। फिर आगे की कहानी तो सबको पता ही है कि योग से रोग भागने की यह कहानी दुनिया में छा गई और इसके साथ ही आयंगार योग भी छा गया।

तांत्रिक साहित्यों के मुताबिक मुद्रा की शिक्षा भी सर्वप्रथम आदिगुरू शिव ने ही माता पार्वती को दी थी। लंबे समय तक यह विद्या गुप्त रही या संन्यासियों की आध्यात्मिक साधनाओं में उपयोग होती रही। प्राचीन कला-कृतियों और शास्त्रीय नृत्यों में भी मुद्राओं का प्रयोग होता था। पर आम लोगों के लिए उन मुद्राओं के क्या मायने हैं, इसका खुलासा संभवत: हठयोग साहित्य के दो रचनाकारों महर्षि घेरंड की घेरंड संहिता और स्वात्माराम की हठप्रदीपिका के कारण हुआ। स्वात्माराम ने तो दस मुद्राओं का ही उल्लेख किया है। पर महर्षि घेरंड की पुस्तक में पच्चीस मुद्राओं का उल्लेख है। वैसे, अलग-अलग योग साहित्यों में लगभग एक सौ मुद्राओं का उल्लेख है। जैसे, विष्णु संहिता में 31 और ज्ञानार्णव तंत्र में 30 मुद्राओं का जिक्र है। पर माना जाता है कि स्वात्माराम और महर्षि घेरंड के कारण मुद्राएं हठयोग का प्रमुख हिस्सा बन पाई थीं। 

सवाल है कि मुद्रा विज्ञान शरीर पर किस तरह काम करता है? आयुर्वेद में कहा गया है कि मनुष्य में पंच महाभूत यानी पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश तत्वों के असंतुलन के कारण बीमारियां होती हैं। योगशास्त्र के मुताबिक मनुष्य की उंगलियों में इन तत्वों के गुण हैं। इसलिए जब मुद्राओं का अभ्यास किया जाता है तो निश्चित बिंदुओं पर दबाव पड़ते ही शरीर के सुप्त ऊर्जा केंद्र मुख्यत: मेरूदंड के चक्र सक्रिय हो जाते हैं।

हम जानते हैं कि प्राणिक शरीर को चक्रों से ऊर्जा मिलती है। पर इस ऊर्जा का ह्रास हो जाने के विविध शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। चूंकि मुद्रा की स्थिति में उंगलियों के रास्ते इन प्राणिक ऊर्जा का प्रवाह बाहर की तरफ नहीं हो पाता है। इसलिए वह ऊर्जा शरीर के पांच कोशों में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश और मनोमय कोश को स्पंदित करती है। इससे स्वस्थ होने की क्षमता विकसित होती है। दैनिक जीवन में हमारी चेतना का 75 प्रतिशत अन्नमय कोश की सजगता में निवास करता। मनोमय कोश में हम अपनी कमजोरियों, इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं के प्रति सजग रहते हैं। प्राणमय कोश शक्ति का आयाम या अनुभव है। 

अब जानते हैं कि मेनुहिन पर शवासन में षण्मुखी मुद्रा क्यों इतना असरदार साबित हुई होगी। षण्मुखी मतलब सप्त द्वार। यानी दो आखें, दो कान, दो नासिकाएं और एक मुंह। इस मुद्रा में ये सभी द्वार बंद हो जाते हैं। प्राण विद्या की यह तकनीक हाथों और उंगलियों से उत्सर्जित ऊर्जा चेहरे की स्नायुओं और पेशियों को उत्प्रेरित और शिथिल करती है। नतीजतन इससे एक साथ कुछ हद तक शांभवी मुद्रा, योनि मुद्रा और प्रत्याहार का फल मिलने लगता है। पेशियों व तंत्रिकाओं पर दबाव कम होते और आंतरिक सजगता बढ़ती है।

न्यूरो कार्डियोलॉजी के मरीजों के मामले में शवासन की अवस्था में पेरिकार्डियम का विस्तार होता है। इससे हृदय के दाहिनी एट्रियम का फैलाव बढ़ जाता है। इससे रक्तचाप कम जाता है। कुल मिलकर गजब की विश्रांति मिलती है। ऐसे में मेनुहिन का चैन से सो जाना लाजिमी ही था। इस एक उदाहरण से मुद्रा योग की अहमियत का सहज अंदाज लगाया जा सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)