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बुद्धि सब कुछ नहीं, भावना प्रमुख है परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती मनुष्य के जीवन में बुद्धि ही सब कुछ नहीं है। मानव जीवन में बुद्धि का अस्तित्व ज्ञान अर्जन के लिए है, निर्णय लेने के लिए है। साथ ही जिस ज्ञान को हम प्राप्त करते हैं, उसको अपने जीवन में उतारने के लिए है। अगर ज्ञान केवल बुद्धि तक ही सीमित रह जाए और जीवन में उतरे ही नहीं तो उस ज्ञान का कोई महत्व नहीं है। पर भावना बुद्धि से सूक्ष्म है। भावना मे विवेक का अंश नहीं होता। हम किसी से स्नेह करते हैं, तो करते हैं। प्रेम करते हैं, तो करते हैं। इसके पीछे कोई तर्क नहीं होता। इस बात को सम्राट अकबर और बीरबल के बीच के संवाद से समझा जा सकता है। सम्राट अकबर ने अपने दरबारियों के सामने इच्छा व्यक्त की कि वे दुनिया के सबसे खूबसूरत व्यक्ति को देखना चाहते हैं। दरबार में...

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September 1, 2021

श्रील प्रभुपाद : भारत के आध्यात्मिक राजदूत

इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (इस्कॉन) के संस्थापक श्रील प्रभुपाद की आज दुनिया भर में 125वीं जयंती मनाई जा रही है। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 125 रुपये का एक विशेष स्मारक सिक्का जारी किया है। भगवान कृष्ण और चैतन्य महाप्रभु के संदेशों को दुनिया भर में फैलाने वाले श्री प्रभुपाद का जन्म 1 सितंबर 1896 को कोलकाता में हुआ था। किशोर कुमार चैतन्य भागवत के मुताबिक चैतन्य महाप्रभु ने कहा था – “मैं संकीर्त्तन आंदोलन का उद्घाटन करने लिए अवतरित हुआ हूं। मैं इस विश्व की समस्त पतित आत्माओं का उद्धार करूंगा.....संसार के प्रत्येक नगर व गांव में नाम उच्चारण करने वाले मेरे संकीर्तन आंदोलन का प्रसार होगा।“ कोई तीन सौ साल पहले की गई इस भविष्यवाणी को उनकी ही परंपरा के आचार्य और गौड़ीय मिशन के महान गुरू श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती के शिष्य श्रील प्रभुपाद ने साकार कर दिखाया।   श्रील प्रभुपाद 1965 में अमेरिका गए...

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तन-मन पर मंत्रों का प्रभाव

चेतना की विशिष्ट अवस्था में मंत्र की ध्वनि से शरीर के प्रमुख छह चक्र प्रभावित होते हैं। इनमें मूलाधार चक्र...

January 10, 2021 Kishore Kumar
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September 29, 2021

भारत में नौ फीसदी लोगों की मौत कैंसर हो जाती है। कैंसर के मरीजों की संख्या में...

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August 31, 2021

आजकल उपलब्ध सुसंगठित योग पुस्तकों में आसन प्राणायाम मुद्रा बंध को अंतर्राष्ट्रीय जगत में एक विशेष स्थान...

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April 5, 2021

संन्यास मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि परोपकार का मार्ग है, साधु प्रकारांतर से परोपकार ही करते हैं : स्वामी शिवानंद सरस्वती

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March 15, 2021

ब्रह्म-विद्या और योग शास्त्र-सिद्धांत दोनों ही है श्रीमद्भगवत गीता

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  प्राणिक ऊर्जा नियंत्रण का विज्ञान है मुद्रा योग। हठयोग में आसन और प्राणायाम के बाद मुद्रा योग प्रमुख है। यह शास्त्र-सम्मत तो है ही,  विज्ञान-सम्मत भी है। तभी रोगोपचार के तौर पर मुद्रा योग भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर देशों में लोकप्रिय है। साठ के दशक में गोल्डी लिप्सन ने अपनी पुस्तक “रिजुवेनेशन थ्रू योगा” में योग मुद्राओं के बारे में लिखा था कि यह उंगलियों का व्यायाम भर है। पर आज पश्चिमी देशों में इसे स्वतंत्र विद्या...

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भृगुसंहिता में कहा गया है कि नियति का निर्माण पहले “काल” में होता है। यानी घटना पहले “काल” में घटती है। उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे? पढ़िए विस्तार से।

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2210
2021

उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे? पढ़िए विस्तार से। उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी

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उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे? पढ़िए विस्तार से। उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी

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उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे? पढ़िए विस्तार से। उसके बाद अंतरिक्ष में। फिर “देश” में। योगेंद्र जी

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जब तुम्हें बताया जाए कि तुम अच्छे हो तो तुम्हें शिथिल नहीं होना चाहिए। बल्कि तुम्हें और अच्छा बनने की कोशिश करनी चाहिए। तुम्हारी लगातार उन्नति, तुम्हारे आसपास के लोगों को और ईश्वर को भी सुख प्रदान करती है।

परमहंस योगानंद