गुणवत्तापूर्ण योग शिक्षा बड़ी चुनौती

किशोर कुमार February 1, 2021

योगविद्या को लेकर लोगों का दृष्टिकोण बदला है। जो योग शिक्षक-प्रशिक्षक समय की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बेहतर देने की स्थिति में होगा, वही प्रतिस्पर्द्धा में टिका रह पाएगा। कुछ भी नहीं चलेगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बीते एक दशक में फटाफट योग की संस्कृति विकसित की गई। फास्ट फूड की तरह। इससे योगाभ्यासियों और योगविद्या में अपना कैरियर देखने वालों का बड़ा अहित हुआ। पर यह सत्य है कि समस्या चाहे जैसी भी हो, उससे उबरने का सूत्र भी उसी में निहित होता हैं। भारत में ऐसे योगियों की कमी नहीं , जिन्होंने विपरीत परिस्थियों में राह बनाई थी और अपनी बौध्दिक व आध्यात्मिक क्षमता का विकास करके योगविद्या को समृद्ध किया।

कोरोना महामारी के बाद भारत में योग का कारोबार ऊंची उड़ान भर रहा है। उद्योग परिसंघों की रिपोर्टों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि कोरोबार सौ बिलियन का हो चुका है, जो वेलनेस सेक्टर के कुल कारोबार का चालीस फीसदी है। योग के मुख्यत: दो पक्ष हैं। एक लौकिक और दूसरा आध्यात्मिक। कारोबार की बात हो रही है तो जाहिर है कि लौकिक पक्ष खासतौर से उपचारात्मक पक्ष की बात है। आम जन के बीच योग के चिकित्सीय पक्ष को लेकर समझ बढ़ने और कोविड-19 की दवा की अनुपलब्धता की वजह से योग कारोबार को पंख लगा। दूसरी तरफ अगले शैक्षणिक सत्र से स्कूलों में भी योग शारीरिक शिक्षा का एक अंग बनने वाला है। दूसरे देशों में भारतीय योगाचार्यों की मांग पहले से है। जाहिर है कि योग के क्षेत्र में रोजगार के बड़े अवसर हैं। चुनौती बस योग शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर है।  

गुणवत्तापूर्ण योग शिक्षा न होने का ही नतीजा है कि कोरोनाकाल से पहले योग व्यवसाय से जीवन-यापन करने वाले लगभग 70 फीसदी योग प्रशिक्षक या तो बेरोजगार हैं या कोई अन्य व्यवसाय में लगे हुए हैं। कोई समोसा बेच रहा है तो कोई स्वास्थ्य सबंधी उत्पादों का वितरक बना हुआ है। इनमें ऐसे योग प्रशिक्षक भी शामिल हैं, जो हठयोग सीखाने में तो सक्षम हैं। पर संप्रेषण या तकनीकी दक्षता के अभाव में स्वर्णिम अवसर गंवाने को मजबूर हैं। यह इस बात का द्योतक है कि योग शिक्षा देने के तरीकों में खोट है। वरना योग की बढ़ती स्वीकार्यता के बीच प्रशिक्षित योगाचार्यों का बेरोजगार रह जाना भला कैसे संभव था? योग के नाम पर कुछ भी और किसी भी तरह परोसने की प्रवृत्ति के कारण ऐसी स्थिति बनी है, जबकि गुणवत्तापूर्ण योग शिक्षा समय की मांग है।

योग परंपरा के संन्यासी दृढ़ता के साथ कहते रहे हैं कि बच्चे जब सात-आठ साल हो जाएं तो कुछ यौगिक क्रियाएं शुरू करानी चाहिए। क्यों? क्या शरीर स्वस्थ्य रहे, इसलिए? नहीं। हमारी परंपरा में योग का लक्ष्य केवल बीमारियों से मुक्ति नहीं रही। योगाभ्यास इसलिए कराया जाता था कि कम उम्र में पीनियल ग्रंथि के क्षय होने की गति धीमी की जा सके। ऐसा होने से पिट्यूटरी ग्रंथि सुरक्षित रहेगी। बच्चों के मस्तिष्क के कार्य, व्यवहार और ग्रहणशीलता नियंत्रित रहेंगे। इससे बौद्धिक विकास होगा और जीवन में स्पष्टता रहेगी। यौन ग्रंथियां समय से पहले सक्रिय नहीं होंगी। स्कूलों के योग शिक्षकों को ऐसे परिणाम हासिल करने के लिए उपयुक्त योगाभ्यासों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। पर वे सक्षम न हुए तो शिक्षित-प्रशिक्षित बेरोजागरो की फौज ही खड़ी होगी।  

शीर्षासन के बड़े-बड़े फायदे हैं। मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति बढ़ती है तो नाड़ी-तंतुओं का बेहतर पोषण होता है। शरीर से विषाक्त द्रव्य निष्कासित होता हैं। इससे मानसिक शक्ति और एकाग्रता में वृद्धि होती है। पर साथ ही चेतावनी भी दी जाती है कि उच्च रक्तचाप और स्लिप डिस्क वाले मरीज इस आसन से दूर रहें। पर सिद्ध संतों की बात निराली होती है। बिहार योग विद्यालय के संस्थापक परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती के पास एक व्यक्ति आया। वह उच्च रक्तचाप की समस्या से परेशान था। स्वामी जी ने कहा, शीर्षासन करो। उसने वैसा ही किया और समस्या दूर हो गई। यह ठीक है कि सामान्य योग प्रशिक्षकों से ऐसे परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वे तो मजबूत इच्छा-शक्ति और शास्त्रसम्मत शिक्षा से ही योग के वास्तविक परिणाम हासिल कर ही सकते हैं।

सवाल है कि योग शिक्षा कैसी हो कि योग शिक्षक-प्रशिक्षक गुणवान बन सकें? इस संदर्भ में स्वामी सत्यानंद सरस्वती से ही जुड़ा एक अन्य प्रसंग गौरतलब है। वे ऋषिकेश के अपने गुरू स्वामी शिवानंद सरस्वती के योग प्रचार संबंधी मिशन पर निकलने से पहले तक योग के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। उनका मार्ग तो संन्यास का था। पर गुरू ने कह दिया कि जाओ, योग का प्रचार करों। ऐसा करने के लिए शक्तिपात के जरिए शक्ति दी। स्वामी सत्यानंद ने विचार किया कि घर-घर योग सीखाने से बेहतर है कि योग शिक्षक तैयार करो और ऐसा शिक्षक, जो हठयोग और राजयोग तक ही सीमित न रहे। उसे समग्र योग यानी कर्मयोग, ज्ञानयोग, मंत्रयोग, लययोग आदि का भी ज्ञान हो। उन्होंने योगविद्या को अष्टांग योग तक सीमित नहीं रखा। उनका मानना था कि अष्टांग योग राजयोग का अंग नहीं है। यह तो समस्त योगमार्गों का अंग है। जैसे, प्रत्याहार का अभ्यास राजयोग, क्रियायोग, कुंडलिनी योग, मंत्रयोग, लययोग, नादयोग या किसी भी योग में किया जाता है। आज यदि योग शिक्षा के मामले में ऐसा दृष्टिकोण हो तो भारत के योगाचार्यों की पूरी दुनिया में तूती बोलेगी।

रही बात इच्छा-शक्ति की तो इस संदर्भ में आयंगार योग के जनक और हठयोग के विश्व प्रसिद्ध योगाचार्य बीकेएस आयंगार से सीख लेनी चाहिए। वे मामूली पढ़-लिख पाए थे। किशोरावस्था तक अंग्रेजी का ज्ञान बिल्कुल नहीं था। पर आधुनिक योग के पितामह के रूप में मशहूर टी कृष्णामाचार्य की दृष्टि पड़ी तो उनकी ऊर्जा का दिशांतरण हुआ। किशोरावस्था में ही पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब में बतौर योग प्रशिक्षक नौकरी मिल गई। जब जीवन पटरी पर आने लगा तो नौकरी छूट गई। सवारी के नाम पर साइकिल थी। वे अपने जीविकोपार्जन के लिए दूर-दूर जाकर लोगों को योग सीखाते और खुद की उन्नति के लिए साधनाएं करते थे। उन्हें समझ में आ गया कि लोगों की तात्कालिक जरूरतें क्या हैं और दूरगामी परिणामों के लिए क्या करना होगा। इन बातों को ध्यान में रखकर अपने को उनके अनुरूप ढाला और हठयोग के पितामह बन गए।

इन तमाम बातों के मद्देनजर सरकार को भी गुणवत्तापूर्ण योग शिक्षा के लिए असरदार कार्य-नीति तैयार करनी होगी। संसद का बजट सत्र चल रहा है। आगामी शैक्षणिक सत्र को ध्यान में रखकर असरदार नीति बनाई जा सकती है। ताकि योग शिक्षको-प्रशिक्षकों के साथ ही छात्रों आम अन्य योग साधकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। यदि स्कूलों में योग शिक्षा को फिजिकल एडुकेशन का हिस्सा न बनाकर स्वतंत्र विषय बना दिया जाए तो बड़ी बात होगी। योग शिक्षकों का एक बड़ा समूह इसकी मांग कर भी रहा है।  

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और योग विज्ञान विश्लेषक हैं।)