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Bhagwan Nityananda

Bhagwan Nityananda

सिद्धयोग परंपरा के प्रेरणास्रोत, बीसवीं सदी के महान योगी और महाराष्ट्र में ठाणे जिले की गणेशपुरी के भगवान नित्यानंद में शक्तिपात दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति के भीतर निष्क्रिय पड़ी दिव्य शक्ति को जगाने की क्षमता थी। वे अपने योग्य शिष्यों को शक्तिपात के जरिए लोकोपकार के लिए सहज ही सिद्ध बना देते थे।

भगवान नित्यानंद का जन्म कब और कहां हुआ, यह वास्तविक रूप से ज्ञात नहीं है। कथा है कि सन् 1897 में एक तूफानी रात थी। सबको अपने घर पहुंचने की जल्दी थी। पेशे से वकील पर आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले ईश्वर अय्यर के घर काम करने वाली उन्नियाम्मा भी पूरी रफ्तार से घर चली जा रही थी। पर बीच रास्ते में घने जंगलों के पास अचानक उसके पांव थम गए। एक नवजात शिशु जमीन पर पड़ा था और कोबरा सांप फन फैलाए उसकी रखवाली कर रहा है। उन्नियाम्मा का वात्सल्य भाव जग गया। उधर, ऐसा लगा मानो सांप को उन्नियाम्मा की ही प्रतीक्षा थी। वह पीछ मुड़ा और जंगलों में विलीन हो गया। उन्नियाम्मा उस शिशु को सीने से लगाए घर पहुंच गई। उसका नाम रखा रमण और अपने बच्चों के साथ उसकी भी परवरिश करने लगी थी।

उस शिशु पर जब ईश्वर अय्यर की नजर गई तो वहीं ठहर गई। उन्हें इस बात का अहसास पहले से था कि जिस शिशु की रखवाली कोबरा सांप कर रहा हो, वह कोई सामान्य बालक नहीं हो सकता। उन्होंने उसे अपने पास रखकर शिक्षा दिलाने का फैसला किया। इसमें वे सफल भी रहे। वही रमण अपनी उच्च आध्यात्मिक साधनाओं के बाद भगवान नित्यानंद के रूप में मशहूर हुए। नित्यानंद नाम के साथ भी एक प्रसंग जुड़ा हुआ है। रमण उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद ईश्वर अय्यर के साथ तीर्थयात्रा पर थे। पहाड़ों में अचानक रमण की आध्यात्मिक शक्तियां जागृत हो गईं। मन बदल गया। घर न लौटन की जिद पर अड़ गए। ईश्वर अय्यर रमण से अलग रहने की सोच भी नहीं सकते थे। पर रमण की तीब्र इच्छा को ध्यान में रखकर वे अकेले ही घर लौट गए। रमण ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे जब कभी याद करेंगे, वह उनके पास प्रस्तुत हो जाएगा।

थोड़े समय बाद ईश्वर अय्यर बीमार पड़े। भरोसा न रहा कि जीवित रह पाएंगे। ऐसे में रमण की एक झलक पाने तीब्र इच्छा हुई और चमत्कार हो गया। रमण उपस्थित हो गए। ईश्वर अय्यर सूर्य के उपासक थे। वे रमण की शक्ति भांप गए थे। लिहाजा अंतिम क्षण में साक्षात सूर्य के दर्शन कराने की इच्छा व्यक्त की। रमण ने तुरंत उनके कमरे अंदर से बंद कर लिया। बाहर खड़े लोगों ने अनुभव किया कि ईश्वर अय्यर का कमरा अकल्पनीय प्रकाश से भरा हुआ है। दरअसल, साक्षात् सूर्य अपने भक्त ईश्वर अय्यर को दर्शन दे रहे थे। अंतिम इच्छा पूरी होने के बाद अय्यर के मुंह से सहसा निकल गया – “तुमने मुझे ब्रह्मानंद दिया है। आज से तुम्हारा नाम नित्यानंद है।“

भगवान नित्यानंद का भले भौतिक शरीर नहीं हैं। पर उनकी अलौकिक शक्तियों, उनकी सूक्ष्म ऊर्जा के प्रवाह को मुंबई से कोई 80 किमी दूर ठाणे जिले के गणेशपुरी स्थित सिद्धपीठ जाने वाले या रहने वाले शिद्दत से महसूस करते हैं। यही स्थल उस महान संत की तपोभूमि है। भगवान नित्यानंद ने इसी स्थान पर शक्तिपात करके स्वामी मुक्तानंद को अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। मौजूदा समय में गुरूमाई चिद्विलासानंद पीठाधीश्वर हैं। सिद्ध गुरूओं से प्रदत्त आध्यत्मिक शक्तियां भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी सिद्धयोग परंपरा को पल्लवित-पुष्पित करने में मददगार है। सच तो यह है कि भक्ति, श्रद्धा और प्रेम ने गणेशपुरी को धरती पर स्वर्ग बना दिया है। सिद्धयोग स्वामी मुक्तानंद द्वारा स्थापित एक आध्यात्मिक मार्ग है। इस मार्ग में पराशक्तिमयी श्रीकुंडलिनी महाविद्या को सिद्धविद्या कहा जाता है और साधक सिद्ध विद्यार्थी कहलाते हैं। सिद्धपीठ में दी गई कुंडलिनी दीक्षा शांभवी दीक्षा कहलाती है। हंस गायत्री व हंस प्रणव इसके जपमंत्र हैं। प्राण-अपान द्वारा हंसानुसंधान ही इस मार्ग का प्राणायाम है।